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निकले चले आते हैं तह-ए-ख़ाक से खाने | शाही शायरी
nikle chale aate hain tah-e-KHak se khane

ग़ज़ल

निकले चले आते हैं तह-ए-ख़ाक से खाने

इस्माइल मेरठी

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निकले चले आते हैं तह-ए-ख़ाक से खाने
ये ख़्वान-ए-करम किस ने बिछाया है ख़ुदा ने

जो दिल में है मुँह फोड़ के बरवर नहीं कहते
मारा मुझे यारों की दुरुस्त और बजा ने

ग़फ़लत में हैं सर-मस्त बदलते नहीं करवट
गो सर पे उठा ली है ज़मीं शोर-ए-दरा ने

इसराफ़ ने अर्बाब-ए-तमव्वुल को डुबोया
आलिम को तफ़ाख़ुर ने तो ज़ाहिद को रिया ने

मर्द उस को समझते न किया हो जिसे बदमस्त
अय्याम-ए-जवानी की मय-ए-होश-रुबा ने

बा-ईं-हमा दरमांदगी इंसाँ के ये दा'वे
क्या ज़ात-ए-शरीफ़ इन को बनाया है ख़ुदा ने

जल्वत का भरोसा है न ख़ल्वत की तवक़्क़ो'
सब वहम था यारों ने जो ताके थे ठिकाने