निकले चले आते हैं तह-ए-ख़ाक से खाने
ये ख़्वान-ए-करम किस ने बिछाया है ख़ुदा ने
जो दिल में है मुँह फोड़ के बरवर नहीं कहते
मारा मुझे यारों की दुरुस्त और बजा ने
ग़फ़लत में हैं सर-मस्त बदलते नहीं करवट
गो सर पे उठा ली है ज़मीं शोर-ए-दरा ने
इसराफ़ ने अर्बाब-ए-तमव्वुल को डुबोया
आलिम को तफ़ाख़ुर ने तो ज़ाहिद को रिया ने
मर्द उस को समझते न किया हो जिसे बदमस्त
अय्याम-ए-जवानी की मय-ए-होश-रुबा ने
बा-ईं-हमा दरमांदगी इंसाँ के ये दा'वे
क्या ज़ात-ए-शरीफ़ इन को बनाया है ख़ुदा ने
जल्वत का भरोसा है न ख़ल्वत की तवक़्क़ो'
सब वहम था यारों ने जो ताके थे ठिकाने
ग़ज़ल
निकले चले आते हैं तह-ए-ख़ाक से खाने
इस्माइल मेरठी

