निकहत-ओ-रंग न मौसम की हवा ठहरी है
गुल की क़िस्मत में ब-हर-हाल फ़ना ठहरी है
ज़ख़्म-ए-दिल खिल उठे हँसते हुए फूलों की तरह
एक लम्हे को जहाँ बाद-ए-सबा ठहरी है
मौत को कहिए इलाज-ए-ग़म-ए-हस्ती लेकिन
ज़िंदगी कौन से जुर्मों की सज़ा ठहरी है
और मंसूर कोई मशहद-ए-हस्ती में न था
लाएक़-ए-दार जो इक मेरी अना ठहरी है
हुस्न-ए-मुख़्तार है हर बात रवा है इस को
फ़ितरत-ए-इश्क़ तो पाबंद-ए-वफ़ा ठहरी है
कोई नग़्मा कोई झंकार कोई होश-रुबा
दिल ही बहला लें तबीअत जो ज़रा ठहरी है
ग़ज़ल
निकहत-ओ-रंग न मौसम की हवा ठहरी है
बख़्तियार ज़िया

