निकहत-ए-तुर्रा-ए-मुश्कीं जो सबा लाई है
कोई आवारा हुआ है कोई सौदाई है
बे-ख़ुदी से है यहाँ बे-ख़बरी का आलम
ख़ुद-नुमाई को वहाँ शग़्ल-ए-ख़ुद-आराई है
अपनी ही जल्वागरी है ये कोई और नहीं
ग़ौर से देख अगर आँख में बीनाई है
है मुझे कश्मकश-ए-सई-ओ-तलब से नफ़रत
दिल मिरा तर्क-ए-तमन्ना का तमन्नाई है
जुज़ दिल-ए-पाक न पाया हरम-ए-ख़ास कहीं
दैर-ओ-काबा में अबस नासिया-फ़रसाई है
नाज़ की जल्वागरी के लिए मंज़र है नियाज़
ना-तवानी मिरी हम-रंग-ए-तवानाई है
जब तबीअ'त ही न हाज़िर हो तो बे-सूद है फ़िक्र
शेर-गोई तो कहाँ क़ाफ़िया-पैमाई है
मुँह पे लाऊँ तो ये कम-ज़र्फ़ बहक जाएँ अभी
बात जो पीर-ए-ख़राबात ने समझाई है
ख़ुद मुनादी ओ मुनादा हूँ न ग़ैबत न हुज़ूर
आलम-ए-ग़ैब से यूँ दिल में निदा आई है
दिल ये कहता है कि हासिल की है तहसील अबस
न तमन्ना कोई शय है न तमन्नाई है
ग़ज़ल
निकहत-ए-तुर्रा-ए-मुश्कीं जो सबा लाई है
इस्माइल मेरठी

