नींद आँखों में रहे फिर भी न सोया जाए
मैं वो पत्थर हूँ कि रोऊँ तो न रोया जाए
अजनबी है तिरे ख़ुश-रंग बदन की ख़ुश्बू
इक ज़रा लम्स-ए-वफ़ा तुझ में समोया जाए
शब के सहरा ने अजब प्यास लिखी है मुझ में
मुझ को ख़ुर्शेद के शो'लों में डुबोया जाए
मैं ने तन्हाई में जल कर भी यही चाहा है
ख़ुशबुओं से तिरे आँचल को भिगोया जाए
ज़िंदगी को है ज़रूरत नए पैराहन की
अपने ही ख़ून में अपने को डुबोया जाए
ग़ज़ल
नींद आँखों में रहे फिर भी न सोया जाए
जाज़िब क़ुरैशी

