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नीम के पत्तों का ज़ख़्मों को धुआँ दे दीजिए | शाही शायरी
nim ke patton ka zaKHmon ko dhuan de dijiye

ग़ज़ल

नीम के पत्तों का ज़ख़्मों को धुआँ दे दीजिए

पी पी श्रीवास्तव रिंद

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नीम के पत्तों का ज़ख़्मों को धुआँ दे दीजिए
फिर मिरी आँखों को पहरे-दारियाँ दे दीजिए

हो सके तो ये नवाज़िश हम फ़क़ीरों पर करें
बुझते रंगों का हमें ये आसमाँ दे दीजिए

शब-परस्तों को भी तस्कीन-ए-अना मिल जाएगी
उन का हक़ है उन को शब-बेदारियाँ दे दीजिए

शाख़ पर काँटों को पैराहन बदलने के लिए
मौसमों को शबनमी बे-सम्तियाँ दे दीजिए

बे-हिसी का ख़ुश्क सा सहरा है आँखों में मिरी
धूल-ए-मंज़र से तो कुछ तुग़्यानीयाँ दे दीजिए

धुँदलके तो नौहा-ख़्वानी में बहुत मसरूफ़ हैं
रात ज़ख़्मी है उसे बैसाखियाँ दे दीजिए

आरिज़ी मौसम को भी एहसास-ए-महरूमी न हो
घर के सन्नाटों को एहसास-ए-ज़ियाँ दे दीजिए

धूप में थोड़ी सी गुंजाइश निकल आए तो 'रिंद'
एक मुट्ठी छाँव का ही साएबाँ दे दीजिए