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निगाहों से निगाहें सामने होते ही जब लड़ियाँ | शाही शायरी
nigahon se nigahen samne hote hi jab laDiyan

ग़ज़ल

निगाहों से निगाहें सामने होते ही जब लड़ियाँ

क़ाएम चाँदपुरी

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निगाहों से निगाहें सामने होते ही जब लड़ियाँ
यकायक खुल गईं दोनों तरफ़ से दिल की कुलझड़ियाँ

ये अब की शब-बरात ऐ यार तुझ बिन हम पे यूँ गुज़री
हवाई तो हमारी आह थी और अश्क फुल-झड़ियाँ

हमारी आह जैसे लख़्त-ए-दिल से गुथ के निकले है
कहीं देखी हैं तीं इस लुत्फ़ से फूलों की भी छड़ियाँ

मुआ मजनूँ तो इक मुद्दत हुई पर अब तक इस ग़म में
करें हैं नाला मिल कर हम-दिगर ज़ंजीर की कड़ियाँ

ज़मीं से ये लगो नहीं गुल भला किस तरह निकले हैं
जो लाखों सूरतें दिलकश नहीं इस ख़ाक में गड़ियाँ

कभू टूटा न मिज़्गाँ से मिरी आँसू का ज़ंजीरा
न जाने अश्क के क़तरे थे या मोती की ये लड़ियाँ

भरे आते हैं 'क़ाएम' पय-ब-पय इस तरह आँसू से
कहे तू चश्म को मेरी कि हैं ये रहट की घड़ियाँ