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निगाह-ए-यार यूँही और चंद पैमाने | शाही शायरी
nigah-e-yar yunhi aur chand paimane

ग़ज़ल

निगाह-ए-यार यूँही और चंद पैमाने

सिराज लखनवी

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निगाह-ए-यार यूँही और चंद पैमाने
अब अपने होश में आने न पाएँ दीवाने

मोहब्बत अस्ल में क्या चीज़ है ख़ुदा जाने
दहन में जितनी ज़बानें हैं उतने अफ़्साने

जो अश्क-ए-सुर्ख़ है नामा-निगार है दिल का
सुकूत-ए-शब में लिखे जा रहे हैं अफ़्साने

जहान-ए-होश में ता-हश्र तब्सिरे होंगे
ज़बाँ में अपनी ये क्या कह रहे थे दीवाने

शुगून उस निगह-ए-मय-फ़रोश से ले कर
हम आप वज़्अ करेंगे हज़ार मयख़ाने

न पूछो आह-ए-मोहब्बत की रख़्ना-अंदाज़ी
ख़ुदा गवाह है अपने हुए हैं बेगाने

हर अश्क-ए-सुर्ख़ है दामान-ए-शब में आग का फूल
बग़ैर शम्अ के भी जल रहे हैं परवाने

क़दम क़दम पे सदा-ए-शिकस्त-ए-तौबा है
निसार-ए-लग़्ज़िश-ए-साक़ी हज़ार पैमाने

फ़रेब-ए-हुस्न-ए-समाअ'त तिरी दुहाई है
हक़ीक़तों की जगह छीनते हैं अफ़्साने

बुलंद-ओ-पस्त नज़र फ़र्क़-ए-ज़ाहिरी है 'सिराज'
बने तो हैं इन्हीं आबादियों से वीराने