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निगाह-ए-नाज़ तिरी जब से कारसाज़ नहीं | शाही शायरी
nigah-e-naz teri jab se karsaz nahin

ग़ज़ल

निगाह-ए-नाज़ तिरी जब से कारसाज़ नहीं

बिस्मिल सईदी

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निगाह-ए-नाज़ तिरी जब से कारसाज़ नहीं
जिगर में दर्द नहीं क़ल्ब में गुदाज़ नहीं

नफ़स नहीं कोई ऐसा कि जाँ-गुदाज़ नहीं
ये मेरा इश्क़ है ज़ाहिद तिरी नमाज़ नहीं

जिसे फ़रिश्तों से क़ुदरत छुपा के रखती है
शराब-ख़ाने में वो राज़ कोई राज़ नहीं

हवस की ज़िंदगी-ए-जावेदाँ पे ला'नत है
बला से उम्र-ए-मोहब्बत अगर दराज़ नहीं

तअ'ल्लुक़ात मोहब्बत की जान होती है
वो इक निगाह ब-ज़ाहिर जो दिल-नवाज़ नहीं

तिरी जफ़ाओं पे है नाज़ जिस क़दर मुझ को
मुझे वफ़ाओं पे भी अपनी इतना नाज़ नहीं

अगर किसी की मोहब्बत में कोई राज़ न हो
तो फिर किसी की मोहब्बत तो कोई राज़ नहीं

निगह भी जुर्म कभी जुर्म-ए-बे-निगाही भी
किसी उसूल पे वो जल्वा-गाह-ए-नाज़ नहीं

मैं बे-नियाज़ सही तुम से भी मोहब्बत मैं
मगर तुम्हारी मोहब्बत से बे-नियाज़ नहीं

तुम अपने हुस्न की खा कर क़सम मुकर जाओ
अगर तुम्हारी मोहब्बत को मुझ पे नाज़ नहीं

कल उन के जल्वों पे था मेरा इख़्तियार-ए-नज़र
और आज अपनी नज़र का भी में मजाज़ नहीं

निगाह-ए-नाज़ के अल्लाह रे ये ग़लत अंदाज़
कोई ये समझे अभी उन को मश्क़-ए-नाज़ नहीं

सुनाई देती है महसूस जान-ओ-दिल हो कर
वो इक सदा जो हनूज़ आश्ना-ए-साज़ नहीं

तुम्हारी बज़्म की ये दोस्त-दारियाँ तौबा
किसी से जैसे किसी को कुछ एहतिराज़ नहीं

खुला हुआ है वो बाब-ए-क़ुबूल-ए-मय-खाना
अगर नहीं दर-ए-तौबा बला से बाज़ नहीं

तिरी अदा-ए-तग़ाफ़ुल की जान से ज़ालिम
वो इक अदा तिरी जिस पर तुझे भी नाज़ नहीं

अब अपने जल्वों का लिल्लाह एहतिराम मुआ'फ़
निगाह-ए-शौक़ को अब ताब-ए-इम्तियाज़ नहीं

दोबारा किस से मिली इश्क़ की निगाह-ए-गर्म
ज़माना-सोज़ है 'बिस्मिल' ज़माना-साज़ नहीं