EN اردو
निगाह-ए-नाज़ में हया भी है | शाही शायरी
nigah-e-naz mein haya bhi hai

ग़ज़ल

निगाह-ए-नाज़ में हया भी है

अज़ीज़ हैदराबादी

;

निगाह-ए-नाज़ में हया भी है
इस बनावट की इंतिहा भी है

बे-सर-ओ-पा नहीं है ये दुनिया
इब्तिदा भी है इंतिहा भी है

शब-ए-फ़ुर्क़त में क्या करे कोई
कुछ अँधेरे में सूझता भी है

मेरी इक मुश्त-ए-ख़ाक के पीछे
बाद-ए-सरसर भी है सबा भी है

बज़्म-ए-रिंदाँ में रिंद भी है 'अज़ीज़'
पारसाओं में पारसा भी है