निगाह आईना है अक्स-ए-मुस्तआर हूँ मैं
हयात क़र्ज़ है मुझ पर तो ज़ेर-ए-बार हूँ मैं
पिघल न जाए अना शिद्दत-ए-तमाज़त से
गिराँ है तब-ए-ख़रीदार कम-अयार हूँ मैं
सवाद-ए-शब में इक आवाज़ पर हूँ गर्म-ए-सफ़र
असीर-ए-ज़ुल्फ़ न आवारा-ए-बहार हूँ मैं
हिनाई हाथों से चेहरा छुपा रहा है वो
शिकस्त-ए-अहद पे भी तहनियत-गुज़ार हूँ मैं
जो पौ फटे तो नवेद-ए-सहर मिले 'इशरत'
हज़ार रातों से सर-ता-पा इंतिज़ार हूँ मैं
ग़ज़ल
निगाह आईना है अक्स-ए-मुस्तआर हूँ मैं
इशरत क़ादरी

