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निगाह आईना है अक्स-ए-मुस्तआर हूँ मैं | शाही शायरी
nigah aaina hai aks-e-mustaar hun main

ग़ज़ल

निगाह आईना है अक्स-ए-मुस्तआर हूँ मैं

इशरत क़ादरी

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निगाह आईना है अक्स-ए-मुस्तआर हूँ मैं
हयात क़र्ज़ है मुझ पर तो ज़ेर-ए-बार हूँ मैं

पिघल न जाए अना शिद्दत-ए-तमाज़त से
गिराँ है तब-ए-ख़रीदार कम-अयार हूँ मैं

सवाद-ए-शब में इक आवाज़ पर हूँ गर्म-ए-सफ़र
असीर-ए-ज़ुल्फ़ न आवारा-ए-बहार हूँ मैं

हिनाई हाथों से चेहरा छुपा रहा है वो
शिकस्त-ए-अहद पे भी तहनियत-गुज़ार हूँ मैं

जो पौ फटे तो नवेद-ए-सहर मिले 'इशरत'
हज़ार रातों से सर-ता-पा इंतिज़ार हूँ मैं