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निडर भी ज़ात में अपनी हूँ ख़ुद से ख़ाइफ़ भी | शाही शायरी
niDar bhi zat mein apni hun KHud se KHaif bhi

ग़ज़ल

निडर भी ज़ात में अपनी हूँ ख़ुद से ख़ाइफ़ भी

मुनीर सैफ़ी

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निडर भी ज़ात में अपनी हूँ ख़ुद से ख़ाइफ़ भी
लहू में मेरे हिरा भी है अर्ज़-ए-ताएफ़ भी

यही नहीं कि फ़रिश्ता न छत पे उतरा कोई
पहुँच सके न फ़लक तक मिरे वज़ाइफ़ भी

पुकारती है मुझे तेरे नाम से दुनिया
बदल के रख दिए तू ने मिरे कवाइफ़ भी

भरम अज़ीज़ था तेरा सो तेरी जानिब से
ख़रीद लाया हूँ अपने लिए तहाइफ़ भी

किया है साथ हमारे जो ज़िंदगी ने 'मुनीर'
रवा रखे न किसी से कोई तवाइफ़ भी