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नज़रों से गुलों की नौ-निहालो | शाही शायरी
nazron se gulon ki nau-nihaalo

ग़ज़ल

नज़रों से गुलों की नौ-निहालो

शाद लखनवी

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नज़रों से गुलों की नौ-निहालो
शबनम की तरह गिरा सँभालो

मानो रह-ए-सरकशी निकालो
पगड़ी मह-ओ-मेहर की उछालो

सय्याद ख़फ़ा है बुलबुल-ओ-कब्क
ख़ामोश रहो न बोलो-चालो

असनाम में शान-ए-हक़ अयाँ है
आँखें हैं तो उन को देखो-भालो

ठहरो कोई दम के मेहमान हैं
चलते तो हैं हम भी चलने वालो

मुश्ताक़-लक़ा है इक ख़ुदाई
अब वा'दा हश्र पर न टालो

झूटे वो तुम ऐ गुलो हो बरसों
बे-दूध जो तिफ़्ल-ए-ग़ुंचा पा लो

छलनी यूँही दिल है नीश-ए-ग़म से
मिज़्गाँ की न बर्छियाँ संभालों

होली नए क़ुमक़ुमों से खेलो
पर ख़ून-ए-दिल-ए-आशिक़ाँ उछालो

मारा ही जो 'शाद' को हसीनो
ख़ातिर से ग़ुबार तो निकालो