EN اردو
नौबत अपनी तो जान तक पहुँची | शाही शायरी
naubat apni to jaan tak pahunchi

ग़ज़ल

नौबत अपनी तो जान तक पहुँची

जोशिश अज़ीमाबादी

;

नौबत अपनी तो जान तक पहुँची
हैफ़ उस के न कान तक पहुँची

दिल के टुकड़े हैं ये सितारे न हों
आह लय आसमान तक पहुँची

है वो आज़ुर्दा बात शिकवे की
क्या किसी मेहरबान तक पहुँची

मुफ़्त फ़र्सूदा हुइ ये पेशानी
न तिरे आस्तान तक पहुँची

दुश्मनी मुझ से तेरी तेग़ ने की
दोस्ती इम्तिहान तक पहुँची

आतिश-ए-इश्क़ ने जो सर खींचा
हुस्न के दूदमान तक पहुँची

बार-ए-ग़म जब किसी से उठ न सका
नौबत इस ना-तवान तक पहुँची

तेरे मक़्तूल का है काम तमाम
कारवाँ उस्तुख़्वान तक पहुँची

आतिश-ए-गुल से जलती मिस्ल-ए-शरर
अंदलीब आशियान तक पहुँची

कोई सर-गश्ता याद आ ही गया
तेग़ उस की जो सान तक पहुँची

देखते उस को महव थे 'जोशिश'
कब शिकायत ज़बान तक पहुँची