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नश्शे में जो है कोहना शराबों से ज़ियादा | शाही शायरी
nashshe mein jo hai kohna sharabon se ziyaada

ग़ज़ल

नश्शे में जो है कोहना शराबों से ज़ियादा

फ़ारिग़ बुख़ारी

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नश्शे में जो है कोहना शराबों से ज़ियादा
उस जिस्म की ख़ुशबू है गुलाबों से ज़ियादा

इक क़तरा-ए-शबनम को तरसते हैं गुलिस्ताँ
ये फ़स्ल तो मुम्सिक है सराबों से ज़ियादा

पढ़ना है तो इंसान को पढ़ने का हुनर सीख
हर चेहरे पे लिक्खा है किताबों से ज़ियादा

पहुँचा हूँ वहीं पर कि चला था मैं जहाँ से
हस्ती का सफ़र भी नहीं ख़्वाबों से ज़ियादा

ये बिखरी हुई ज़िंदगी यकजा नहीं होती
कम होने पे भी हम हैं ख़राबों से ज़ियादा

'फ़ारिग़' कभी घटती ही नहीं दर्द की दौलत
होती है हमेशा ये हिसाबों से ज़ियादा