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नर्गिस पे तो इल्ज़ाम लगा बे-बसरी का | शाही शायरी
nargis pe to ilzam laga be-basari ka

ग़ज़ल

नर्गिस पे तो इल्ज़ाम लगा बे-बसरी का

हफ़ीज़ होशियारपुरी

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नर्गिस पे तो इल्ज़ाम लगा बे-बसरी का
अरबाब-ए-गुलिस्ताँ पे नहीं कम-नज़री का

तौफ़ीक़-ए-रिफ़ाक़त नहीं उन को सर-ए-मंज़िल
रस्ते में जिन्हें पास रहा हम-सफ़री का

अब ख़ानका ओ मदरसा ओ मय-कदा हैं एक
इक सिलसिला है क़ाफ़िला-ए-बे-ख़बरी का

हर नक़्श है आईना-ए-नैरंग-ए-तमाशा
दुनिया है कि हासिल मिरी हैराँ-नज़री का

अब फ़र्श से ता-अर्श ज़बूँ-हाल है फ़ितरत
इक म'अरका दर-पेश है अज़्म-ए-बशरी का

कब मिलती है ये दौलत-ए-बेदार किसी को
और मैं हूँ कि रोना है इसी दीदा-वरी का

बे-वासता-ए-इश्क़ भी रंग-ए-रुख़-ए-परवेज़
उनवान है फ़रहाद की ख़ूनीं-जिगरी का

आख़िर तिरे दर पे मुझे ले आई मोहब्बत
देखा न गया हाल मिरी दर-बदरी का

दिल में हो फ़क़त तुम ही तुम आँखों पे न जाओ
आँखों को तो है रोग परेशाँ-नज़री का

बे-पैरवी-ए-'मीर' 'हफ़ीज़' अपनी रविश है
हम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कम-हुनरी का