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नर्गिस-ए-मस्त तिरी जाए जो तुल बरसर-ए-गुल | शाही शायरी
nargis-e-mast teri jae jo tul barsar-e-gul

ग़ज़ल

नर्गिस-ए-मस्त तिरी जाए जो तुल बरसर-ए-गुल

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

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नर्गिस-ए-मस्त तिरी जाए जो तुल बरसर-ए-गुल
तेग़-ए-अबरू से गिरावे सर-ए-गुल बरसर-ए-गुल

मौजज़न देख तिरे हुस्न का दरिया-ए-बहार
बाँध दे बाद-ए-सबा ख़ाक के पुल बरसर-ए-गुल

अपनी नाज़ुक-बदनी से जो हो साक़ी को ख़बर
फिर तो हरगिज़ न पिए बैठ के मुल बरसर-ए-गुल

खोल कर बाग़ में तेरा जुज़-ए-मजमूआ-ए-हुस्न
आज लाई है सबा आफ़त-ए-कुल बरसर-ए-गुल

गर 'बक़ा' नाज़ से गोया हो मिरा ग़ुंचा-दहन
गर्दन-ए-ग़ुंचा गिरे शर्म से ढुल बरसर-ए-गुल