नक़्द-ए-जाँ की मिरे सौग़ात अभी बाक़ी है
शब-ए-हिज्राँ की मुदारात अभी बाक़ी है
धूप में तर्क-ए-मरासिम की झुलसने वाले
आख़िरी शाम-ए-मुलाक़ात अभी बाक़ी है
ख़ालिक़-ए-कौन-ओ-मकाँ हम से नहीं है नाराज़
गर्दिश-ए-अर्ज़-ओ-समावात अभी बाक़ी है
वक़्त की धूप में खोए मिरे नश्शे कितने
इक तिरी चश्म-ए-ख़राबात अभी बाक़ी है
रोज़-ए-अव्वल से अजल खेल रही है शतरंज
मुझ को शह हो भी चुकी मात अभी बाक़ी है
चाँदनी पर है तुम्हें रंग-ए-सहर का धोका
गुल न कर देना दिए रात अभी बाक़ी है
हर ग़ज़ल की मुझे तकमील पे महसूस हुआ
दिल में कहने को कोई बात अभी बाक़ी है
ग़ज़ल
नक़्द-ए-जाँ की मिरे सौग़ात अभी बाक़ी है
फ़रासत रिज़वी

