नहर जिस लश्कर की निगरानी में तब थी अब भी है
ख़ेमे वालों की जो बस्ती तिश्ना-लब थी अब भी है
उड़ रहे हैं वक़्त की रफ़्तार से मग़रिब की सम्त
वक़्त-ए-आग़ाज़-ए-सफ़र जो तीरा शब थी अब भी है
वक़्त जैसे एक ही साअत पे आ के रुक गया
पहले जिस शिद्दत से जो दिल में तलब थी अब भी है
हम शिकायत आँख की पलकों से करते किस तरह
दास्तान-ए-ज़ुल्म वर्ना याद सब थी अब भी है
हुस्न में फ़ितरी हिजाबाना रविश अब हो न हो
इश्क़ के मस्लक में जो हद्द-ए-अदब थी अब भी है
रोज़ ओ शब बदलेंगे अपने किस तरह आए यक़ीं
सूरत-ए-हालात जो पहले अजब थी अब भी है
हैं बक़ा के वसवसे में इब्तिदा से मुब्तला
दिल में इक तशवीश सी जो बे-सबब थी अब भी है
नाम इस का आमरियत हो कि हो जम्हूरियत
मुंसलिक फ़िरऔनियत मसनद से तब थी अब भी है
ग़ज़ल
नहर जिस लश्कर की निगरानी में तब थी अब भी है
मुर्तज़ा बिरलास

