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नहीं सूझता कोई चारा मुझे | शाही शायरी
nahin sujhta koi chaara mujhe

ग़ज़ल

नहीं सूझता कोई चारा मुझे

निज़ाम रामपुरी

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नहीं सूझता कोई चारा मुझे
तुम्हारी जुदाई ने मारा मुझे

इधर आँख लड़ती है अग़्यार से
उधर करते जाना इशारा मुझे

तू इक बार सुन ले मिरा हाल कुछ
न कुछ कहने देना दोबारा मुझे

यूँही रोज़ आने को कहते हो तुम
नहीं ए'तिबार अब तुम्हारा मुझे

किसी से मुझे कुछ शिकायत नहीं
'निज़ाम' अपने ही दिल ने मारा मुझे