नहीं सूझता कोई चारा मुझे
तुम्हारी जुदाई ने मारा मुझे
इधर आँख लड़ती है अग़्यार से
उधर करते जाना इशारा मुझे
तू इक बार सुन ले मिरा हाल कुछ
न कुछ कहने देना दोबारा मुझे
यूँही रोज़ आने को कहते हो तुम
नहीं ए'तिबार अब तुम्हारा मुझे
किसी से मुझे कुछ शिकायत नहीं
'निज़ाम' अपने ही दिल ने मारा मुझे
ग़ज़ल
नहीं सूझता कोई चारा मुझे
निज़ाम रामपुरी

