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नहीं निकले ज़बाँ से उन के धोके में जो हाँ हो कर | शाही शायरी
nahin nikle zaban se un ke dhoke mein jo han ho kar

ग़ज़ल

नहीं निकले ज़बाँ से उन के धोके में जो हाँ हो कर

शोला करारवी

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नहीं निकले ज़बाँ से उन के धोके में जो हाँ हो कर
गुमाँ बदले यक़ीं हो कर यक़ीं बदले गुमाँ हो कर

खटकता हूँ ज़माने की नज़र में नीम-जाँ हो कर
मोहब्बत में हुआ काँटा ज़ईफ़-ओ-ना-तवाँ हो कर

दिया दर्स-ए-अमल दुनिया को सरगर्म-ए-फ़ुग़ाँ हो कर
जगाया मेरे नालों ने ज़माने को अज़ाँ हो कर

छुपाए से कहीं छुपता है जल्वा हुस्न-ए-फ़ितरत का
अयाँ है वो निहाँ हो कर निहाँ है वो अयाँ हो कर

ये है एजाज़-ए-उल्फ़त आज तक आशिक़ जो ज़िंदा है
वगर न मिट चुका होता वो बेनाम-ओ-निशाँ हो कर

भला इस तरह का जीना भी है जीना कोई 'शो'ला'
निगाहों में सुबुक हो कर ज़माने पर गराँ हो कर