नहीं निकले ज़बाँ से उन के धोके में जो हाँ हो कर
गुमाँ बदले यक़ीं हो कर यक़ीं बदले गुमाँ हो कर
खटकता हूँ ज़माने की नज़र में नीम-जाँ हो कर
मोहब्बत में हुआ काँटा ज़ईफ़-ओ-ना-तवाँ हो कर
दिया दर्स-ए-अमल दुनिया को सरगर्म-ए-फ़ुग़ाँ हो कर
जगाया मेरे नालों ने ज़माने को अज़ाँ हो कर
छुपाए से कहीं छुपता है जल्वा हुस्न-ए-फ़ितरत का
अयाँ है वो निहाँ हो कर निहाँ है वो अयाँ हो कर
ये है एजाज़-ए-उल्फ़त आज तक आशिक़ जो ज़िंदा है
वगर न मिट चुका होता वो बेनाम-ओ-निशाँ हो कर
भला इस तरह का जीना भी है जीना कोई 'शो'ला'
निगाहों में सुबुक हो कर ज़माने पर गराँ हो कर
ग़ज़ल
नहीं निकले ज़बाँ से उन के धोके में जो हाँ हो कर
शोला करारवी

