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नहीं मिलते 'शुऊर' आँसू बहाते | शाही शायरी
nahin milte shuur aansu bahate

ग़ज़ल

नहीं मिलते 'शुऊर' आँसू बहाते

अनवर शऊर

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नहीं मिलते 'शुऊर' आँसू बहाते
नज़र आते हैं हँसते-मुस्कुराते

वो घंटों बैठते हैं दोस्तों में
मगर देखा अकेले आते जाते

निकल जाते हैं ना-मालूम जानिब
वो गिर्द-ओ-पेश से नज़रें बचाते

जिसे कहते हैं लोग उम्मुल-ख़बाइस
रहे उन के उसी से रिश्ते-नाते

वो क्या जिन्नात से करते हैं बातें
उन्हें पाया गया है बुदबुदाते

उठा पाए न अपना बोझ भी वो
भला क्या दूसरों के काम आते

अयाँ था बे-ख़ुदी से हाल उन का
कोई क्या पूछता वो क्या बताते

बता लेते हैं मौसम हर तरह का
अनादिल बोस्ताँ में रोते गाते

'शुऊर' आप आए हैं मिलने सर-ए-शाम
हमारे पास होती तो पिलाते