नहीं मालूम क्या वाजिब है क्या फ़र्ज़
मिरे मज़हब में है तेरी रज़ा फ़र्ज़
शुऊ'र-ए-हस्ती-ए-मौहूम है कुफ़्र
फ़ना बा'द-ए-फ़ना बा'द-ए-फ़ना फ़र्ज़
नहीं आगाह मस्त-ए-बादा-ए-शौक़
कहाँ सुन्नत किधर वाजिब कुजा फ़र्ज़
रह-ए-तस्लीम में अज़-रु-ए-फ़त्वा
दुआ वाजिब प तर्क-ए-मुद्दआ फ़र्ज़
न छूटे कुफ़्र में भी वज़-ए-ईमाँ
कि हर हालत में है याद-ए-ख़ुदा फ़र्ज़
नहीं देखा किसी ने हुस्न-ए-मस्तूर
ब-क़द्र-ए-फ़हम लेकिन कर लिया फ़र्ज़
न मानूँगा न मानूँगा कभी मैं
मुझे करते हैं क्यूँ उस से जुदा फ़र्ज़
न खोलूँगा न खोलूँगा ज़बाँ को
कि है इख़्फ़ा-ए-राज़-ए-दिलरुबा फ़र्ज़
बला से कोई माने या न माने
चलो हम कर चुके अपना अदा फ़र्ज़
ग़ज़ल
नहीं मालूम क्या वाजिब है क्या फ़र्ज़
इस्माइल मेरठी

