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नहीं कि चारा-ए-दर्द-ए-निहाँ नहीं मालूम | शाही शायरी
nahin ki chaara-e-dard-e-nihan nahin malum

ग़ज़ल

नहीं कि चारा-ए-दर्द-ए-निहाँ नहीं मालूम

जिगर बरेलवी

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नहीं कि चारा-ए-दर्द-ए-निहाँ नहीं मालूम
दिल-ए-हज़ीं को हो मंज़ूर हाँ नहीं मालूम

ले आई है हमें वहशत कहाँ नहीं मालूम
सवाद-ए-दश्त है या गुलिस्ताँ नहीं मालूम

शहीद-ए-नाज़ की मय्यत चले हैं दफ़नाने
मगर है कूचा-ए-जानाँ कहाँ नहीं मालूम

हज़ारों ख़ार चुभे हैं हमारे तलवों में
क़दम हैं किस लिए अब भी रवाँ नहीं मालूम

सुबूत-ए-इश्क़ में हम जान दे तो दें लेकिन
यक़ीं भी लाएगा बद-गुमाँ नहीं मालूम

अज़ल से लोटते अँगारों पर हम आए हैं
है कब तक और अभी इम्तिहाँ नहीं मालूम

इलाज क्या करें हम और क्या बताएँ हाल
कहीं है दर्द मगर है कहाँ नहीं मालूम

जला दिल और हुआ राख मुद्दतें गुज़रीं
ये अब उठा है कहाँ से धुआँ नहीं मालूम

न जाने कौन सी मंज़िल पे है कि गुम हैं हवास
दिल-ए-हज़ीं है कहाँ हम कहाँ नहीं मालूम

चमन में हम न ख़स-ओ-ख़ार-ए-आशियाँ बाक़ी
लपक रही हैं ये क्यूँ बिजलियाँ नहीं मालूम

ग़म-ओ-मलाल से पाया कभी न दिल ने फ़राग़
क़फ़स मिला कि हमें आशियाँ नहीं मालूम

थी क़ैद-ए-ज़ीस्त कि आग़ोश-ए-ग़म किसी की 'जिगर'
ये रूह जाए निकल कर कहाँ नहीं मालूम

कहाँ गए वो शब-ओ-रोज़ और वो माह-ओ-साल
कभी 'जिगर' भी हुए थे जवाँ नहीं मालूम