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नहीं आसाँ किसी के वास्ते तख़्मीना मेरा | शाही शायरी
nahin aasan kisi ke waste taKHmina mera

ग़ज़ल

नहीं आसाँ किसी के वास्ते तख़्मीना मेरा

ग़ुलाम हुसैन साजिद

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नहीं आसाँ किसी के वास्ते तख़्मीना मेरा
मुक़र्रर है दयार-ए-ग़ैब से रोज़ीना मेरा

दम-ए-रुख़्सत अगर मैं हौसले से काम लेता
पलट कर देख सकता था उसे आईना मेरा

हदफ़ बन पाएँगी आँखें न मेरे दुश्मनों की
मुक़ाबिल है ख़दंग-ए-ख़्वाब के अब सीना मेरा

पड़ा रहता हूँ कुंज-ए-आफ़ियत में सर छुपा कर
गुज़र जाता है यूँ ही सब्त और आदीना मेरा

बुढ़ापा छा रहा है मेरे हर जज़्बे पे लेकिन
जवाँ होता चला जाता है फिर भी कीना मेरा

बदल सकता था मेरे शहर का आहंग 'साजिद'
अगर तरतीब पा सकता कभी साज़ीना मेरा