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नग़्मा यूँ साज़ में तड़पा मिरी जाँ हो जैसे | शाही शायरी
naghma yun saz mein taDpa meri jaan ho jaise

ग़ज़ल

नग़्मा यूँ साज़ में तड़पा मिरी जाँ हो जैसे

शानुल हक़ हक़्क़ी

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नग़्मा यूँ साज़ में तड़पा मिरी जाँ हो जैसे
मेरा दम हो मिरे सीने की फ़ुग़ाँ हो जैसे

यक-ब-यक रूह में उट्ठा है वो तूफ़ान-ए-ख़मोश
वादी-ए-गुल में नसीम-ए-गुज़राँ हो जैसे

नग़्मा-ओ-रक़्स हुई जाती है हर मौज-ए-ख़याल
चाँदनी-रात में दरिया का समाँ हो जैसे

क्या सुनाती है ये साज़ों की सदा-ए-दिल-सोज़
कुछ हमीं दर्द-नसीबों का बयाँ हो जैसे

यूँ तिरी चश्म-ए-मुदारात पे दिल भोला है
नश्शा-ए-मय पे जवानी का गुमाँ हो जैसे

दिल है यूँ बे-दिली-ए-होश के हाथों लर्ज़ां
कोई क़ातिल से तलब-गार-ए-अमाँ हो जैसे

राह जीने की कहाँ सोख़्ता-जानी के बग़ैर
हर नफ़स शो'ला-ए-ख़ातिर का धुआँ हो जैसे

ख़ूब नक़्शा है मिरे फ़िक्र की जौलानी का
कोई कम-बख़्त असीरी में जवाँ हो जैसे

उस ने यूँ अर्ज़-ए-मोहब्बत पे सँभल कर देखा
उस के दिल को तो ख़बर हो न गुमाँ हो जैसे

इक नवा हासिल-ए-सद-अहद-ए-फ़ुग़ाँ है 'हक़्क़ी'
बू-ए-गुल लाख बहारों का निशाँ हो जैसे