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नफ़्स-ए-सग-ए-पलीद को गर अपने मारिए | शाही शायरी
nafs-e-sag-e-palid ko gar apne mariye

ग़ज़ल

नफ़्स-ए-सग-ए-पलीद को गर अपने मारिए

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही

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नफ़्स-ए-सग-ए-पलीद को गर अपने मारिए
मानिंद-ए-शेर दश्त-ए-जहाँ में डकारिए

उस गुल को जोश-ए-गुल में ये कह कर उभारिए
गुलशन में अंदलीब को चल कर पुकारिए

फिर मुर्ग़-ए-दिल को फाँसिए फिर जाल मारिए
फिर हो सके तो आप से गेसू सँवारिए

पीरी में कैफ़-ए-इश्क़ से तौबा तो कीजिए
मंज़िल रही है थोड़ी सी हिम्मत न हारिए

गिर्दाब-ए-बहर-ए-इश्क़ के चक्कर हैं रात दिन
कौन आश्ना-ए-हाल है किस को पुकारिए

दिल दे के जौर-ओ-ज़ुल्म का शिकवा न कीजिए
दो दिन की ज़िंदगी किसी ढब से गुज़ारिए

अहल-ए-हवस की दहर में मिट्टी ख़राब है
गलियों में ख़ाक छान रही हैं न्यारिये

मानिंद-ए-ज़ुल्फ़ ग़ैर को क्यूँ सर चढ़ाइए
आँखों से शक्ल-ए-अश्क के इस को उतारिए

पैदा करें असर जो दुर-ए-अश्क नासेहो
उन मोतियों पे हँस को सौ बार वारिए

जुज़ मेरे दाल आप की गलती नहीं कहीं
यूँ मुँह से जितनी चाहिए शेख़ी बघारिए

नाला जो ज़ेर-ए-तेग़ किया मैं ने जिस घड़ी
बोले कि एक दम के लिए दम न मारिए

तौबा शराब-ए-इश्क़ से किस तरह कीजिए
क्यूँकर ये जिन चढ़ा हुआ सर से उतारिए

क्या क्या न दोस्त अपने मियान-ए-अदम गए
किस को तलाश कीजिए किस को पुकारिए

उस बुत के बहर-ए-हुस्न में दिल को डुबोइए
इस कश्ती-ए-हयात को यूँ पार उतारिए

मंज़ूर हो जो राहत-ए-कौनैन 'मुंतही'
हाथों को खीच लीजिए पाँव पसारिए