नफ़रत जो है दिल में लब-ए-ख़ंदाँ में नहीं है
जो बात है मज़मूँ में वो उनवाँ में नहीं है
क्या जानिए कल पिछले पहर कैसी हवा थी
ख़ुश्बू का पता आज गुलिस्ताँ में नहीं है
ऐ मस्जिद-ए-अक़्सा तू जले और मैं देखूँ
क्या अज़्म-ए-तहफ़्फ़ुज़ भी निगहबाँ में नहीं है
मतलूब है वो जिंस जो नायाब बहुत है
उस चीज़ की ख़्वाहिश है जो इम्काँ में नहीं है
जो सोच सके मेरे लिए मेरी तरह से
वो शख़्स मिरे हल्क़ा-ए-याराँ में नहीं है
ऐ 'रश्क' हो जिस से दिल-ए-दरिया मुतलातुम
ऐसा कोई अंदाज़ ही तूफ़ाँ में नहीं है
ग़ज़ल
नफ़रत जो है दिल में लब-ए-ख़ंदाँ में नहीं है
सुलतान रशक

