नफ़ाज़-ए-नज़्म पुर-इसरार है ऐसा नहीं लगता
गुलिस्ताँ में कोई सरकार है ऐसा नहीं लगता
यहाँ हर जेब में ख़्वाबों की ज़र-मुहरें खनकती हैं
ये दुनिया दर्द का बाज़ार है ऐसा नहीं लगता
हम अपनी झोंक में आगे की जानिब बढ़ते जाते हैं
हमारे सामने दीवार है ऐसा नहीं लगता
सर-ए-पिंदार से पा-ए-जुनूँ का रब्त ग़ाएब है
ये पीढ़ी बरसर-ए-पैकार है ऐसा नहीं लगता
मैं जैसे एक राह-ए-सुस्त-रौ की सैर करता हूँ
मिरी रानों तले रहवार है ऐसा नहीं लगता
उमड के आया तो है अब्र-ए-गिर्या मतला-ए-जाँ से
मगर ये साइक़ा-बरदार है ऐसा नहीं लगता
ब-यक जस्त-ए-तसव्वुर बज़्म-ए-जानाँ में पहुँचता है
ये 'अरशद' हिज्र का बीमार है ऐसा नहीं लगता
ग़ज़ल
नफ़ाज़-ए-नज़्म पुर-इसरार है ऐसा नहीं लगता
अरशद अब्दुल हमीद

