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नद्दी नद्दी रन पड़ते हैं जब से नाव उतारी है | शाही शायरी
naddi naddi ran paDte hain jab se naw utari hai

ग़ज़ल

नद्दी नद्दी रन पड़ते हैं जब से नाव उतारी है

एज़ाज़ अफ़ज़ल

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नद्दी नद्दी रन पड़ते हैं जब से नाव उतारी है
तूफ़ानों के कस-बल देखे अब मल्लाह की बारी है

नींद रगों में दौड़ रही है पोर पोर बेदारी है
जिस्म बहुत हस्सास है लेकिन दिल जज़्बात से आरी है

आवाज़ों के पैकर ज़ख़्मी लफ़्ज़ों के बुत लहूलुहान
करते हैं इज़हार-ए-तफ़न्नुन कहते हैं फ़नकारी है

मंज़िल मंज़िल पाँव जमा कर हम भी चले थे हम-सफ़रो
उखड़ी उखड़ी चाल का बाइ'स राह की ना-हमवारी है

आँख थकन ने खोली है या अज़्म-ए-सफ़र ने करवट ली
पर फैला कर बैठोगे या उड़ने की तय्यारी है

सच कहते हो नीव में इस की टेढ़ी कोई ईंट नहीं
आड़ी-तिरछी छत का बाइ'स घर की कज-दीवारी है

क्या कहिए क्यूँ आज सरों से ज़ख़्मों का बोझ उठ न सका
पत्थर थे लेकिन हल्के थे फूल है लेकिन भारी है

बस्ती बस्ती क़र्या क़र्या कोसों आँगन है न मुंडेर
ज़ेहन ख़राबा दिल वीराना घर आ'साब पे तारी है

एक दिया और इतना रौशन जैसे दहकता सूरज हो
कहने वाले सच कहते हैं रात बहुत अँधियारी है