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नाला करना कि आह करना | शाही शायरी
nala karna ki aah karna

ग़ज़ल

नाला करना कि आह करना

मीर असर

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नाला करना कि आह करना
दिल में 'असर' उस के राह करना

कुछ ख़ूब नहीं ये तेरी बातें
हर-चंद मुझे निबाह करना

तेरा वो जौर ये मिरा सब्र
इंसाफ़ से टुक निगाह करना

क्या लुत्फ़ है ले के दिल मुकरना
और उल्टे मुझे गवाह करना

रहमत के हुज़ूर बे-गुनाही
मत शैख़ को रू-सियाह करना

जी अब के बचा ख़ुदा ख़ुदा कर
फिर और बुतों की चाह करना

क्या कहिए 'असर' तो आप टुक देख
यूँ हाल अपना तबाह करना