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न रहा शिकवा-ए-जफ़ा न रहा | शाही शायरी
na raha shikwa-e-jafa na raha

ग़ज़ल

न रहा शिकवा-ए-जफ़ा न रहा

ग़ुलाम मौला क़लक़

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न रहा शिकवा-ए-जफ़ा न रहा
हो के दुश्मन भी आश्ना न रहा

बेवफ़ा जान-ओ-माल बे-सर्फ़ा
क्या रहा जब कि दिल-रुबा न रहा

सभी अग़्यार हैं सभी आशिक़
ए'तिमाद उस का एक जा न रहा

ख़ाक था जिस चमन की रंग-ए-इरम
पत्ते पत्ते का वाँ पता न रहा

वस्ल में क्या विसाल मुश्किल था
याद पर रोज़ हिज्र का न रहा

ख़त मिरा वाँ गया गया न गया
सर-ए-क़ासिद रहा रहा न रहा

दिल में रहता है कौन ग़म के सिवा
कोई इस घर में दूसरा न रहा

ग़ैर और शिकवा-ए-जफ़ा तुम से
हाए मैं क़ाबिल-ए-वफ़ा न रहा

क्या हुआ क्यूँ 'क़लक़' को रोते हो
कोई इस दहर में सदा न रहा