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न पूछ दिल के ख़राबे से और क्या निकला | शाही शायरी
na puchh dil ke KHarabe se aur kya nikla

ग़ज़ल

न पूछ दिल के ख़राबे से और क्या निकला

प्रेम वारबर्टनी

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न पूछ दिल के ख़राबे से और क्या निकला
बड़ी तलाश के ब'अद एक नक़्श-ए-पा निकला

रुके तो चाँद बहुत दूर था तसव्वुर से
चले तो चार ही क़दमों का फ़ासला निकला

ख़िरद के फूल तो मुरझा गए बहारों में
जुनूँ का ज़ख़्म ख़िज़ाँ में हरा-भरा निकला

सियाह रात में लौ दे उठे लहू के चराग़
रुबाब-ए-इश्क़ से वो शोला-ए-नवा निकला

सफ़र-ए-शबाब का हद-दर्जा मुख़्तसर था मगर
बहुत तवील सराबों का सिलसिला निकला

निगाह-ए-नाज़ में मस्ती भी है तक़द्दुस भी
शराब-ख़ाने का मंदिर से राब्ता निकला

विसाल-ए-यार तो क़िस्मत की बात है बे-शक
ख़याल-ए-यार भी हम से बहुत ख़फ़ा निकला

निगार-ए-शेर ने सोला-सिंगार जिस में किए
वो आइना मिरे अश्कों का आईना निकला

कमाल-ए-चश्म-ए-नज़ारा तो देखिए ऐ 'प्रेम'
बयाज़-ए-जिस्म का हर राज़ ख़ुशनुमा निकला