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न पाया खोज बरसों नक़्श-ए-पा-ए-रफ़्तगाँ ढूँढे | शाही शायरी
na paya khoj barson naqsh-e-pa-e-raftagan DhunDhe

ग़ज़ल

न पाया खोज बरसों नक़्श-ए-पा-ए-रफ़्तगाँ ढूँढे

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस

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न पाया खोज बरसों नक़्श-ए-पा-ए-रफ़्तगाँ ढूँढे
न हो मुमकिन पता जिन का उन्हें कोई कहाँ ढूँढे

तलाश इस तरह बज़्म-ए-ऐश में है बे-निशानों की
कोई कपड़े में जैसे ज़ख़्म-ए-सोज़न का निशाँ ढूँढे

हम उस के ज़िक्र ही से ख़ुश किया करते हैं दिल अपना
सहारा जैसे तिनके का ग़रीक़-ए-नीम-जाँ ढूँढे

किधर को रूठ कर जाता रहा अहद-ए-शबाब अपना
न पाया इस मुसाफ़िर को हज़ारों कारवाँ ढूँढे

उठाना हो सुबुक आदम पे जब बार-ए-अमानत का
कहाँ से फिर कोई इस के लिए बार-ए-गिराँ ढूँढे

गिरह साँसों में डाली है 'हवस' इफ़रात-ए-गिर्या ने
न आह-ए-ना-तवाँ आने को लब तक नर्दबाँ ढूँढे