न पावे चाल तेरे की पियारे ये ढलक दरिया
चला जावे अगरचे रोवता महशर तलक दरिया
कहाँ ऐसा मुबक्की हो कि जावे ता-फ़लक दरिया
नहीं हम-चश्म मेरे अश्क का मारे है झुक दरिया
हुआ है चश्म-ए-हैरत देख तेरी आब रफ़्तारी
किनारे नहिं रहा है खोल इन दोनों पलक दरिया
भर आवे आब-ए-हसरत उस के मुँह में जब लहर आवे
अगर देखे तिरे इन नर्म गालों के थलक दरिया
नहीं हैं ये हुबाब आते हैं जो नज़रों में मर्दुम की
जलन मुझ अश्क की सीं दिल में रखता है फलक दरिया
अगर हो कोह तो रेले सीं इस लश्कर के चल जावे
कहाँ सकता है मुझ अंझुवाँ की फ़ौजाँ सीं अटक दरिया
असर करने का नहिं संगीं-दिलाँ में रोवना हरगिज़
करारे सख़्त हैं बे-जा रहा है सर पटक दरिया
यक़ीं आया किया जब उस के तईं पानी सीं भी पतला
हमारे अश्क की गर्मी में कुछ रखता था शक दरिया
नहीं मुमकिन हमारे दिल की आतिश का बुझा सकना
करे गर अब्र-ए-तूफ़ाँ-ख़ेज़ कूँ आ कर कुमक दरिया
न होवे 'आबरू' ख़ाना-ख़राबी क्यूँ कि मर्दुम की
क्या अंझुवाँ में मेरे अब समा सीं ता-समक दरिया
ग़ज़ल
न पावे चाल तेरे की पियारे ये ढलक दरिया
आबरू शाह मुबारक

