न निशात-ए-चारासाज़ी न मलाल-ए-कम-निगाही
मुझे उस नज़र ने मारा बे-गुनाह बे-गुनाही
सर-ए-अंजुमन ग़नीमत है बुतों की कम-निगाही
कि सुकून-ए-दिल पे आती है नज़र से भी तबाही
ये सियासत-ए-बहाराँ है ख़िज़ाँ की बे-पनाही
कि जो जल उठे नशेमन तो चमन न दे गवाही
तिरी अंजुमन से बाहर कई आफ़्ताब निकले
न धुली किसी सहर से किसी रात की सियाही
तिरे शहर से निकलते ही मिज़ाज-ए-दहर ला ही
न वो रब्त-ए-शबनम-ओ-गुल न वो बाद-ए-सुब्ह-गाही
तिरे शहर-ए-आरज़ू में यूँही कट गई हैं रातें
न जुनूँ की आँख झपकी न ख़िरद ने ली जमाही
दिए तेरी रहगुज़ारों के जहाँ जहाँ जले हैं
न चराग़-ए-बुत-कदा है न चराग़-ए-ख़ानक़ाही
न सनम-कदे की मंज़िल न हरम का आस्ताना
वो नज़र जहाँ उठी है वहीं रुक गए हैं राही
कोई 'शोर' ये तो पूछे दर-ओ-बाम-ए-ख़ुसरवी से
ये लहू से किस के रौशन है चराग़-कज-कुलाही
ग़ज़ल
न निशात-ए-चारासाज़ी न मलाल-ए-कम-निगाही
मंज़ूर हुसैन शोर

