EN اردو
न ख़ुशी दे तो कुछ दिलासा दे | शाही शायरी
na KHushi de to kuchh dilasa de

ग़ज़ल

न ख़ुशी दे तो कुछ दिलासा दे

जावेद अख़्तर

;

न ख़ुशी दे तो कुछ दिलासा दे
दोस्त जैसे हो मुझ को बहला दे

आगही से मिली है तन्हाई
आ मिरी जान मुझ को धोका दे

अब तो तकमील की भी शर्त नहीं
ज़िंदगी अब तो इक तमन्ना दे

ऐ सफ़र इतना राएगाँ तो न जा
न हो मंज़िल कहीं तो पहुँचा दे

तर्क करना है गर तअल्लुक़ तो
ख़ुद न जा तू किसी से कहला दे