न ख़ुम-ओ-सुबू हुए चूर अभी न हिजाब-ए-पीर-ए-मुग़ाँ उठा
अभी मस्त बादा-परस्त हैं अभी लुत्फ़-ए-बादा कहाँ उठा
जो हुज़ूर चीं-ब-जबीं हुए कहा किस ने शोर-ए-फ़ुग़ाँ उठा
रहे ख़ैर बर्क़-ए-निगाह की कोई दिल जला न धुआँ उठा
ये कहे ज़माना जवाँ है तो क़दम ऐसा मर्द-ए-जवाँ उठा
जो न बार-ए-इश्क़ उठा सके तो बला से तेग़-ओ-सिनाँ उठा
ये कहाँ बहार-ए-जमाल है कि जहाँ ख़िज़ाँ न ज़वाल है
तिरी बज़्म-ए-नाज़ से जो उठा वो हसीं उठा वो जवाँ उठा
जो बढ़े तो जान पे आ बने जो घटे तो जान पे आ बने
जिसे दिल नसीब से मिल गया अजब उस के दर्द-ए-निहाँ उठा
किसी रहगुज़र में पड़े हैं हम अबस आसमाँ की हैं रंजिशें
कोई लाख उठाए उठेंगे क्या कहीं पाँव का भी निशाँ उठा
है हिजाब-ए-हुस्न का ये असर किसी ख़ुद-परस्त को क्या ख़बर
जो अज़ल से सीने में जोश था वही बन के शोर-ए-फ़ुग़ाँ उठा
किसी मय-कदा में रहा 'जिगर' कि था महव-ए-ख़्वाब में रात भर
हुईं क्या बशारतें सुब्ह-दम कि उठा तो ज़मज़मा-ख़्वाँ उठा
जो हुए फ़रिश्तों में मशवरे करे कौन इश्क़ की राह तय
कमर अपनी बाँध के जो उठा तो 'जिगर' सा मर्द-ए-जवाँ उठा
ग़ज़ल
न ख़ुम-ओ-सुबू हुए चूर अभी न हिजाब-ए-पीर-ए-मुग़ाँ उठा
जिगर बरेलवी

