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न खुले उक़्दा-हा-ए-नाज़-ओ-नियाज़ | शाही शायरी
na khule uqda-ha-e-naz-o-niyaz

ग़ज़ल

न खुले उक़्दा-हा-ए-नाज़-ओ-नियाज़

असग़र गोंडवी

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न खुले उक़्दा-हा-ए-नाज़-ओ-नियाज़
हुस्न भी राज़ और इश्क़ भी राज़

राज़ की जुस्तुजू में मरता हूँ
और मैं ख़ुद हूँ एक पर्दा-ए-राज़

बाल-ओ-पर में मगर कहाँ पाएँ
बू-ए-गुल यानी हिम्मत-ए-परवाज़

साज़-ए-दिल क्या हुआ वो टूटा सा
सारी हस्ती है गोश-बर-आवाज़

लज़्ज़त-ए-सज्दा-हा-ए-शौक़ न पूछ
हाए वो इत्तिसाल-ए-नाज़-ओ-नियाज़

देख रानाई-ए-हकीक़त को
इश्क़ ने भर दिया है रंग-ए-मजाज़

साज़-ए-हस्ती का जाएज़ा कैसा
तार क्या देख तार की आवाज़