न जुनूँ जाएगा कभी मेरा
यार है ग़ैरत-ए-परी मेरा
दिल न ले ऐ सनम बरा-ए-ख़ुदा
कुछ बहलता है इस से जी मेरा
उस का हैरान हूँ जो कहता है
देख ले मुँह न आरसी मेरा
अब नहीं दिल को ताब फ़ुर्क़त की
दम निकलता है ऐ परी मेरा
लज़्ज़त-ए-क़त्ल क्या कहूँ क़ातिल
चाटती है लहू छुरी मेरा
जान-ए-जाँ ज़िक्र कर न जाने का
दम निकल जाएगा अभी मेरा
ग़ुंचा-ए-गुल तो हँस के कहता है
मुँह चिढ़ाने लगी कली मेरा
अब की फ़ुर्क़त में गर रहा जीता
देखिएगा न मुँह कभी मेरा
बे-निशाँ हों मिसाल अन्क़ा की
नाम ऐ 'अर्श' तो सही मेरा
ग़ज़ल
न जुनूँ जाएगा कभी मेरा
मीर कल्लू अर्श

