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न जुनूँ जाएगा कभी मेरा | शाही शायरी
na junun jaega kabhi mera

ग़ज़ल

न जुनूँ जाएगा कभी मेरा

मीर कल्लू अर्श

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न जुनूँ जाएगा कभी मेरा
यार है ग़ैरत-ए-परी मेरा

दिल न ले ऐ सनम बरा-ए-ख़ुदा
कुछ बहलता है इस से जी मेरा

उस का हैरान हूँ जो कहता है
देख ले मुँह न आरसी मेरा

अब नहीं दिल को ताब फ़ुर्क़त की
दम निकलता है ऐ परी मेरा

लज़्ज़त-ए-क़त्ल क्या कहूँ क़ातिल
चाटती है लहू छुरी मेरा

जान-ए-जाँ ज़िक्र कर न जाने का
दम निकल जाएगा अभी मेरा

ग़ुंचा-ए-गुल तो हँस के कहता है
मुँह चिढ़ाने लगी कली मेरा

अब की फ़ुर्क़त में गर रहा जीता
देखिएगा न मुँह कभी मेरा

बे-निशाँ हों मिसाल अन्क़ा की
नाम ऐ 'अर्श' तो सही मेरा