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न जाने कब से बराबर मिरी तलाश में है | शाही शायरी
na jaane kab se barabar meri talash mein hai

ग़ज़ल

न जाने कब से बराबर मिरी तलाश में है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

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न जाने कब से बराबर मिरी तलाश में है
ये कौन ख़ुद मिरे अंदर मिरी तलाश में है

वो मुझ में और किसी को तलाश करता है
जो मेरे पास भी रह कर मिरी तलाश में है

गिला था जिस को कि मैं उस का आईना न बनी
अब अपने साए से थक कर मिरी तलाश में है

उबल पड़ूँ न मैं इक दिन कहीं किनारों से
ज़मीन हूँ मैं समुंदर मिरी तलाश में है