यूँ तो है दहर में हर दर्द का हर ग़म का इलाज
काश हो जाए मिरी काहिश-ए-पैहम का इलाज
अमन-ए-साहिल है जो तुग़्यानी-ए-बरहम का इलाज
फिर तो मुश्किल नहीं इंसाँ के किसी ग़म का इलाज
ज़िंदगी छीनने वाले तिरी क़ुदरत की क़सम
तेरे हाथों में था बीमार शब-ए-ग़म का इलाज
हाँ वही फूल जो शबनम की बदौलत महके
उन से भी हो न सका गिर्या-ए-शबनम का इलाज
जब सताया ग़म-ए-दौराँ ने तो इतनी पी ली
एक आलम से क्या दूसरे आलम का इलाज
पीने वालो अभी कुछ देर मेरे साथ रहो
आप कर सकते हैं कुछ दीदा-ए-पुर-नम का इलाज
अब तो एहसास मुझे भी यही होता है 'अज़ीज़'
मेरे अशआ'र में मुज़्मर है मिरे ग़म का इलाज
ग़ज़ल
यूँ तो है दहर में हर दर्द का हर ग़म का इलाज
अज़ीज़ वारसी

