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यूँ तो है दहर में हर दर्द का हर ग़म का इलाज | शाही शायरी
یوں تو ہے دہر میں ہر درد کا ہر غم کا علاج

ग़ज़ल

यूँ तो है दहर में हर दर्द का हर ग़म का इलाज

अज़ीज़ वारसी

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यूँ तो है दहर में हर दर्द का हर ग़म का इलाज
काश हो जाए मिरी काहिश-ए-पैहम का इलाज

अमन-ए-साहिल है जो तुग़्यानी-ए-बरहम का इलाज
फिर तो मुश्किल नहीं इंसाँ के किसी ग़म का इलाज

ज़िंदगी छीनने वाले तिरी क़ुदरत की क़सम
तेरे हाथों में था बीमार शब-ए-ग़म का इलाज

हाँ वही फूल जो शबनम की बदौलत महके
उन से भी हो न सका गिर्या-ए-शबनम का इलाज

जब सताया ग़म-ए-दौराँ ने तो इतनी पी ली
एक आलम से क्या दूसरे आलम का इलाज

पीने वालो अभी कुछ देर मेरे साथ रहो
आप कर सकते हैं कुछ दीदा-ए-पुर-नम का इलाज

अब तो एहसास मुझे भी यही होता है 'अज़ीज़'
मेरे अशआ'र में मुज़्मर है मिरे ग़म का इलाज