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न छुटा हाथ से यक लहज़ा गरेबाँ मेरा | शाही शायरी
na chhuTa hath se yak lahza gareban mera

ग़ज़ल

न छुटा हाथ से यक लहज़ा गरेबाँ मेरा

हसरत अज़ीमाबादी

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न छुटा हाथ से यक लहज़ा गरेबाँ मेरा
चश्म-ए-तर ही पे रहा गोशा-ए-दामाँ मेरा

जिस तरफ़ गुज़रे करे रू-ए-ज़मीं को गुलज़ार
सैर-ए-गुलशन से फिरे जब गुल-ए-ख़ंदाँ मेरा

खेलें आपस में परी-चेहरा जहाँ ज़ुल्फ़ें खोल
कौन पूछे है वहाँ हाल-ए-परेशाँ मेरा

बख़्त हैं शोर ये अपने ही कि वो नाैशीं लब
औरों का चश्मा-ए-हैवाँ है नमक-दाँ मेरा

औरों की आँखों को देखूँ हूँ मैं दीदार-नसीब
बना रोने को यही दीदा-ए-गिर्यां मेरा

दूर उस लब से जो गुज़रे है दिल-ए-पुर-ख़ूँ पर
जाने मेरा ही जिगर और ये दंदाँ मेरा

बे-अजल मरता रहा इश्क़ में उस के उम्र भर
कहूँ किस मुँह पे मैं 'हसरत' वो है जानाँ मेरा