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न बर्क़ न शोला ने शरर हूँ | शाही शायरी
na barq na shoala ne sharar hun

ग़ज़ल

न बर्क़ न शोला ने शरर हूँ

मीर असर

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न बर्क़ न शोला ने शरर हूँ
जो कहिए सो क़िस्सा मुख़्तसर हूँ

जूँ अक्स मेरा कहाँ ठिकाना
तेरे जल्वे से जल्वा-गर हूँ

ऐ नक़्श-ए-क़दम रह-ए-फ़ना में
मैं तुझ से टुक एक पेशतर हूँ

ये ख़ैर है ख़ैर-ए-महज़ है तो
बंदा गंदा जो मैं बशर हूँ

मालूम हुई न कुछ हक़ीक़त
मैं क्या हूँ कौन हूँ किधर हूँ

ऐ उम्र-ए-ब-बाद-ए-रफ़्ता ले चल
मैं भी तेरे ही हम-सफ़र हूँ

जूँ शोला मियान-ए-बे-क़रारी
क़ाएम अपने क़रार पर हूँ

हूँ नाला-ए-ना-रसा व-लेकिन
अपने हक़ में तो कारगर हूँ

आते हैं नज़र सभी हुनर-मंद
मैं ही एक साफ़ बे-हुनर हूँ

हूँ तीर-ए-बला का मैं निशाना
शमशीर-ए-जफ़ा का मैं सिपर हूँ

लेना मिरी ख़ैर-ख़बर तो ख़ैर दिला
ग़ाफ़िल हूँ निपट ही बे-ख़बर हूँ

भूले भी कभू न याद करना
बार-ए-ख़ातिर मैं इस क़दर हूँ

हूँ लग़व मैं आप अपनी ज़ातों
औरों का नफ़अ ने ज़रर हूँ

तेरे दामन से लग रहा हूँ
अपनी तर-दामनी से तर हूँ

दर्द की ज़ात-ए-पाक का है
गो ऐन नहीं वले 'असर' हूँ