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न ऐ दिल सूरत-ए-शैख़-ए-हरम दीवाना बन जाना | शाही शायरी
na ai dil surat-e-shaiKH-e-haram diwana ban jaana

ग़ज़ल

न ऐ दिल सूरत-ए-शैख़-ए-हरम दीवाना बन जाना

पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़

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न ऐ दिल सूरत-ए-शैख़-ए-हरम दीवाना बन जाना
कहीं आना न जाना ज़ाएर-ए-बुत-ख़ाना बन जाना

तुम्हारी दीदा-ए-मख़मूर को ये ख़ूब आता है
कभी शीशा कभी साग़र कभी पैमाना बन जाना

अजब आलम है मद-होशों का तेरी जोश-ए-मस्ती में
कभी दीवाना बन जाना कभी मस्ताना बन जाना

दिल-ए-सोज़ाँ दिखाना जल्वा हुस्न-ओ-इश्क़ दोनों का
कहीं शम-ए-शबिस्ताँ और कहीं परवाना बन जाना

ये थी तल्क़ीन-ए-साक़ी वक़्त-ए-रुख़्सत अपनी मस्तों को
कहीं दीवाना बन जाना कहीं फ़रज़ाना बन जाना

उसी में कुछ मफ़र अपना नज़र आया हसीनों को
कि जा कर देर में चुपके बुत-ए-बुत-ख़ाना बन जाना

करिश्मे हैं ये सारे जलवा-ए-हुस्न-ए-हक़ीक़ी के
कहीं आशिक़ कहीं अंदाज़-ए-माशूक़ाना बन जाना

नवा-ए-राज़ साज़-ए-इश्क़ बे-ख़ुद क्यूँ न कर डाले
कि हर पर्दे से आती है सदा दीवाना बन जाना

यही इबरत-सरा-ए-दहर का हर रोज़ नक़्शा है
कहीं काशाना हो जाना कहीं वीराना बन जाना

ख़बर किस को थी यूँ आलम में रुस्वाई मिरी होगी
कि उन्वान-ए-मोहब्बत को भी था अफ़्साना न बन जाना

ये आलम बेख़ूदी-ए-इश्क़ का ऐ 'शौक़' क्या कहिए
तसव्वुर में किसी के आप से बेगाना बन जाना