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न अब वो इश्क़ न वो इश्क़ की अदाएँ रहीं | शाही शायरी
na ab wo ishq na wo ishq ki adaen rahin

ग़ज़ल

न अब वो इश्क़ न वो इश्क़ की अदाएँ रहीं

बिस्मिल सईदी

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न अब वो इश्क़ न वो इश्क़ की अदाएँ रहीं
न अब वो हुस्न न वो हुस्न की हवाएँ रहीं

न इश्क़ इश्क़ रहा अब न हुस्न हुस्न रहा
न वो वफ़ाएँ रहीं अब न वो जफ़ाएँ रहीं

वो हुस्न-ओ-इश्क़ के राज़-ओ-नियाज़ ही न रहे
न वो ख़ताएँ रहीं अब न वो सज़ाएँ रहीं

मिज़ाज-ए-हुस्न-ओ-मुहब्बत में सादगी न फ़रेब
न वो यक़ीन रहा अब न वो दग़ाएँ रहीं

ग़ुरूर-ए-हुस्न की बे-इल्तिफ़ातियों की तरह
निगाह-ए-शौक़ रही अब न इल्तिजाएँ रहीं

न वो अयादत-ओ-तस्कीं न वो दिल-ए-रंजूर
न अब वो दर्द-ए-मोहब्बत न वो दवाएँ रहीं

न ज़िंदगी से वो नफ़रत न मौत की हसरत
वो बद-दुआएँ रहीं अब न वो दुआएँ रहीं

रबाब-ए-इश्क़ न मिज़राब-ए-हुस्न कुछ भी नहीं
वो नग़्मा-हा-ए-तमन्ना न वो सदाएँ रहीं

न मय-कदा न वो मय-ख़्वार और न वो साक़ी
न वो चमन न बहारें न वो घटाएँ रहीं

बदल गए सहर-ओ-शाम-ए-ज़िंदगी 'बिस्मिल'
वो ज़िंदगी के मनाज़िर न वो फ़ज़ाएँ रहीं