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मुस्तक़िल दीद की ये शक्ल नज़र आई है | शाही शायरी
mustaqil did ki ye shakl nazar aai hai

ग़ज़ल

मुस्तक़िल दीद की ये शक्ल नज़र आई है

राम कृष्ण मुज़्तर

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मुस्तक़िल दीद की ये शक्ल नज़र आई है
दिल में अब आप की तस्वीर उतर आई है

तू ने किस लुत्फ़ से छेड़ा है उन्हें मौज-ए-नसीम
झूम कर ज़ुल्फ़-ए-सियह ता-ब-कमर आई है

कह रहे हैं तिरी आँखों के बदलते तेवर
ये हँसी आज ब-अंदाज़-ए-दिगर आई है

ज़िंदगी नाच कि वो जान-ए-चमन जान-ए-बहार
दस्त-ए-रंगीं में लिए साग़र-ए-ज़र आई है

दिल हो मसरूर कि आग़ोश-ए-ख़िज़ाँ-दीदा में फिर
लहलहाती हुई शाख़-ए-गुल-ए-तर आई है

वो ज़-सर-ता-ब-क़दम हुस्न की इक आब लिए
जगमगाती हुई मानिंद-ए-गुहर आई है

हो न हैराँ कि अँधेरे हैं उजालों की दलील
शाम के बा'द ही ऐ दोस्त सहर आई है

बन के ग़र्क़ाब सफ़ीने की मचलती हुई याद
सीना-ए-बहर पे इक मौज उभर आई है

करम-ए-रहबर-ए-सादिक़ के निसार ऐ 'मुज़्तर'
ज़िंदगी सख़्त मराहिल से गुज़र आई है