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मुसीबत थी हमारे ही लिए क्यूँ | शाही शायरी
musibat thi hamare hi liye kyun

ग़ज़ल

मुसीबत थी हमारे ही लिए क्यूँ

अज़ीज़ लखनवी

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मुसीबत थी हमारे ही लिए क्यूँ
ये माना हम जिए लेकिन जिए क्यूँ

न आना और फिर इल्ज़ाम देना
कि इतने बे-असर नाले किए क्यूँ

पस-ए-ख़ुम पीने में है क्या बुज़ुर्गी
जो पीना है तो फिर छुप कर पिए क्यूँ

जो दी थी हुस्न में ये दिल-फ़रेबी
मुझे होश-ओ-हवास इतने दिए क्यूँ

ख़याल-ए-जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ न रक्खा
हमारे ज़ख़्म में टाँके दिए क्यूँ

'अज़ीज़' इल्ज़ाम देता है मुझे ज़ब्त
न थी तासीर तो नाले किए क्यूँ