मुँह-बंद हसरतों को सुख़न-आश्ना करो
तोड़ो सुकूत साज़-ए-ग़ज़ल इब्तिदा करो
लाओ कहीं से संग-ए-मलामत ही क्यूँ न हो
यारो शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की दुआ करो
मासूम लग़्ज़िशों की बहुत दाद मिल चुकी
अब आश्ना-ए-ग़ैर के ताने सुना करो
हारे हुए ख़ुलूस पे शर्मिंदगी है क्यूँ
किस ने नहीं कहा था कि दिल का किया करो
नादान हो जहाँ का चलन देखते नहीं
रस्म-ए-जफ़ा को आम ब-नाम-ए-वफ़ा करो
फिर कोई जाँ-नवाज़ बहाना तराश लो
फिर कोई दिल-फ़रेब अछूती ख़ता करो
मिल जाएगा 'जमील' कोई ज़ख़्म कोई फूल
आओ न तुम भी कूचा-ए-दिल में सदा करो
ग़ज़ल
मुँह-बंद हसरतों को सुख़न-आश्ना करो
जमील मलिक

