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मुँह-बंद हसरतों को सुख़न-आश्ना करो | शाही शायरी
munh-band hasraton ko suKHan-ashna karo

ग़ज़ल

मुँह-बंद हसरतों को सुख़न-आश्ना करो

जमील मलिक

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मुँह-बंद हसरतों को सुख़न-आश्ना करो
तोड़ो सुकूत साज़-ए-ग़ज़ल इब्तिदा करो

लाओ कहीं से संग-ए-मलामत ही क्यूँ न हो
यारो शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की दुआ करो

मासूम लग़्ज़िशों की बहुत दाद मिल चुकी
अब आश्ना-ए-ग़ैर के ताने सुना करो

हारे हुए ख़ुलूस पे शर्मिंदगी है क्यूँ
किस ने नहीं कहा था कि दिल का किया करो

नादान हो जहाँ का चलन देखते नहीं
रस्म-ए-जफ़ा को आम ब-नाम-ए-वफ़ा करो

फिर कोई जाँ-नवाज़ बहाना तराश लो
फिर कोई दिल-फ़रेब अछूती ख़ता करो

मिल जाएगा 'जमील' कोई ज़ख़्म कोई फूल
आओ न तुम भी कूचा-ए-दिल में सदा करो