मुँह अपनी रिवायात से फेरा नहीं करते
दुश्मन को अचानक कभी घेरा नहीं करते
दीवार के पीछे कोई रहज़न न छुपा हो
इस वास्ते हम घर में अँधेरा नहीं करते
जिस पेड़ की छाँव भी लगे धूप की सूरत
उस पेड़ पे पंछी भी बसेरा नहीं करते
आँखों से न पढ़ ले कोई चेहरे की उदासी
उस डर से कभी ज़िक्र वो मेरा नहीं करते
बस यूँही हमें याद तो आ जाता है वर्ना
दानिस्ता कभी तज़्किरा तेरा नहीं करते
हम सींचते हैं किश्त-ए-सहर अपने लहू से
माँगे हुए सूरज से सवेरा नहीं करते
लहराते हैं शानों पे 'हसन' ज़ुल्फ़ वो कम कम
साया तो वो करते हैं घनेरा नहीं करते
ग़ज़ल
मुँह अपनी रिवायात से फेरा नहीं करते
हसन रिज़वी

