EN اردو
मुमकिन नहीं कि तेरी मोहब्बत की बू न हो | शाही शायरी
mumkin nahin ki teri mohabbat ki bu na ho

ग़ज़ल

मुमकिन नहीं कि तेरी मोहब्बत की बू न हो

दाग़ देहलवी

;

मुमकिन नहीं कि तेरी मोहब्बत की बू न हो
काफ़िर अगर हज़ार बरस दिल में तू न हो

क्या लुत्फ़-ए-इंतिज़ार जो तू हीला-जू न हो
किस काम का विसाल अगर आरज़ू न हो

महशर में और उन से मिरी दू-ब-दू न हो
कहने की बात है जो कोई गुफ़्तुगू न हो

क़ातिल अगर न शोख़ हो ख़ंजर अगर न तेज़
रग रग में बे-क़रार हमारा लहू न हो

ख़ल्वत में तुझ को चैन नहीं किस का ख़ौफ़ है
अंदेशा कुछ न हो जो नज़र चार सू न हो

सुर्ख़ी है तेग़ पर न हिना तेरे हाथ में
क़ातिल कहीं सफ़ेद अदू का लहू न हो

वो आदमी कहाँ है वो इंसान है कहाँ
जो दोस्त का हो दोस्त अदू का अदू न हो

दिल को मसल मसल के ज़रा हाथ सूघिंए
मुमकिन नहीं कि ख़ून-ए-तमन्ना की बू न हो

ज़ाहिद मज़ा तो जब है अज़ाब ओ सवाब का
दोज़ख़ में बादा-कश न हों जन्नत में तू न हो

माशूक़-ए-हिज्र उस से ज़ियादा कोई नहीं
क्या दिल-लगी रहे जो तिरी आरज़ू न हो

ऐसे कहाँ नसीब कि वो बुत हो हम-कलाम
हम तूर पर भी जाएँ तो कुछ गुफ़्तुगू न हो

दस्त-ए-दुआ को मिलती है तासीर अर्श से
जो हाथ से हो पाँव से वो जुस्तुजू न हो

ग़श आ न जाए देख के क़ातिल को मौज-ए-ख़ूँ
नाज़ुक-मिज़ाज का कहीं हल्का लहू न हो

है लाग का मज़ा दिल-ए-बे-मुद्दआ के साथ
तुम क्या करो किसी को अगर आरज़ू न हो

ये टूट कर कभी न बनेगा किसी तरह
ज़ाहिद शिकस्त-ए-तौबा शिकस्त-ए-सबू न हो

ऐ 'दाग़' आ के फिर गए वो इस को क्या करें
पूरी जो ना-मुराद तिरी आरज़ू न हो